कांग्रेस का आरोप, वैधानिक जिम्मेदारी से भाग रहा जनजातीय मंत्रालय

नई दिल्ली, 08 सितंबर (हि.स.)। वन अधिकार कानून, 2006 (एफआरए) के तहत वन भूमि के डायवर्जन से पहले ग्राम सभा की भूमिका को लेकर केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के हालिया रुख पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि मंत्रालय कानून की गलत व्याख्या कर अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है। उन्होंने सवाल किया कि क्या मंत्रालय पर ‘मोदानी’ समूह और अन्य खनन कंपनियों का दबाव है।

रमेश ने मंगलवार को जारी आधिकारिक बयान में कहा कि 31 अगस्त को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ऊर्जा मंत्रालय को बताया कि वन अधिकार कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों में गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के डायवर्जन से पहले ग्रामसभा की सहमति से जुड़ा प्रावधान नहीं है। यह रुख मंत्रालय के अपने पुराने दिशा-निर्देशों और पूर्व में अपनाई गई कानूनी स्थिति के विपरीत है।

उन्होंने कहा कि 12 जुलाई 2012 को जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्यों को पत्र भेजकर स्पष्ट किया था कि वन भूमि के डायवर्जन और वनवासी समुदायों से जुड़े मामलों में एफआरए की धारा-4 का अनुपालन जरूरी है। जनवरी 2018 में भी मंत्रालय ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के उस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी, जिसमें एफआरए अनुपालन की शर्त को वन स्वीकृति की प्रक्रिया के बाद के चरण में ले जाने की बात थी।

रमेश ने कहा कि जनजातीय कार्य मंत्रालय एफआरए के क्रियान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है। ऐसे में वह कानून के दायरे से खुद को अलग नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति कानून और उन समुदायों दोनों को कमजोर करने वाली है, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए यह कानून बनाया गया था।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 31 अगस्त को ऊर्जा मंत्रालय के एनएचपीसी डेस्क को भेजे कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि वन अधिकार कानून (एफआरए), 2006 और इसके तहत बनाए गए नियमों में स्टेज-2 वन स्वीकृति के लिए ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। वह केवल उन जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं की पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन (आरएंडआर) योजनाओं को मंजूरी देता है, जिनमें परियोजना से प्रभावित अनुसूचित जनजाति (एसटी) परिवार शामिल होते हैं।

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