ईपीएफओ की कार्रवाई पर उठे सवाल, जूट मिलों के पीएफ ट्रस्ट की छूट का मामला गरमाया

जूट उद्योग को पुनर्जीवित करने की कोशिशों के बीच राज्य सरकार और ईपीएफओ के बीच समन्वय पर सवाल

कोलकाता, 03 अक्टूबर ( हि.स.)। पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग को पुनर्जीवित करने की राज्य सरकार की कोशिशों के बीच जूट मिलों के पीएफ ट्रस्ट की छूट रद्द किए जाने को लेकर ईपीएफओ की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। मिल प्रबंधन और श्रमिक संगठनों के एक वर्ग का कहना है कि इस कार्रवाई से उद्योग और श्रमिकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, इन आरोपों पर ईपीएफओ का पक्ष सामने आना बाकी है।

तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार के श्रम विभाग ने 30 जनवरी 2026 को एक सामान्य अधिसूचना जारी कर पश्चिम बंगाल की जूट मिलों को कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम की धारा 17 के तहत मिली छूट समाप्त करने का निर्णय लिया था। संबंधित कार्रवाई को लेकर बाद में कुछ मिल प्रबंधन अदालत पहुंचे।

न्यायिक कार्यवाही में इस प्रक्रिया और इसके कानूनी आधार पर सवाल उठे हैं। शक्तिगढ़ टेक्सटाइल एंड इंडस्ट्रीज (हेस्टिंग्स मिल) के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 30 जनवरी की अधिसूचना तथा उसके आधार पर हुई आगे की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई है। अदालत के समक्ष यह भी सवाल था कि क्या सभी संबंधित प्रतिष्ठानों के संबंध में एक सामान्य आदेश के आधार पर छूट समाप्त की जा सकती है और क्या आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया गया था।

नॉर्थ ब्रुक जूट कंपनी के मामले में भी हाईकोर्ट ने छूट समाप्त करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर मिल को राहत दी। मामले में 1960 की छूट संबंधी अधिसूचना और बाद में लागू किए गए प्रावधानों के बीच संबंध तथा उनकी वैधानिक प्रयोज्यता पर विचार किया गया।

कांकिनारा मामले ने बढ़ाई चिंता

कांकिनारा जूट मिल का मामला भी इस विवाद में महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार ने मिल को दोबारा शुरू करने की घोषणा की थी। इसके बाद मिल के पीएफ ट्रस्ट से जुड़ी छूट समाप्त किए जाने की कार्रवाई ने मिल प्रबंधन और श्रमिकों के बीच चिंता पैदा की।

मिल से जुड़े पक्षों का सवाल है कि जब सरकार बंद जूट मिलों को पुनः चालू करने और रोजगार बहाल करने की दिशा में कदम उठा रही है, तब उसी क्षेत्र से जुड़ी एक अन्य सरकारी संस्था द्वारा पीएफ ट्रस्ट के संबंध में प्रतिकूल कार्रवाई किए जाने से नीतिगत समन्वय पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मिल पक्ष का यह भी दावा है कि कांकिनारा के पीएफ ट्रस्ट को पूर्व में ईपीएफओ की मूल्यांकन व्यवस्था में स्थान मिला था। हालांकि, किसी रैंकिंग में स्थान मिलना और वैधानिक छूट बनाए रखने की पात्रता—दोनों अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। इसलिए इस आधार पर लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई को स्वतः अवैध ठहराना उचित नहीं होगा।

राजनीतिक एजेंडे के आरोप पर प्रमाण जरूरी

कुछ मिल प्रबंधन और राजनीतिक हलकों की ओर से यह आरोप लगाया जा रहा है कि ईपीएफओ की कार्रवाई पिछली राज्य सरकार की नीति को आगे बढ़ाने जैसी है। हालांकि, किसी सरकारी संस्था द्वारा किसी राजनीतिक दल का एजेंडा लागू करने का निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस दस्तावेजी या न्यायिक आधार आवश्यक होगा। उपलब्ध न्यायिक कार्यवाहियों से फिलहाल मुख्य रूप से कार्रवाई की वैधानिकता, प्रक्रिया और संबंधित नियमों की व्याख्या से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं।

जूट उद्योग में पीएफ ट्रस्ट का मुद्दा सीधे श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और वर्षों की बचत से जुड़ा है। ऐसे में मिल प्रबंधन और श्रमिक संगठनों की मांग है कि छूट समाप्त करने की कार्रवाई का आधार, अपनाई गई प्रक्रिया और उसके श्रमिकों पर प्रभाव को स्पष्ट किया जाए।

अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 30 जनवरी 2026 की सामान्य अधिसूचना के आधार पर जिन अन्य जूट मिलों के पीएफ ट्रस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई है, उनके मामलों की समीक्षा किस स्तर पर होगी। साथ ही, राज्य सरकार और ईपीएफओ के बीच इस विषय पर नीतिगत समन्वय किस प्रकार सुनिश्चित किया जाएगा, इस पर भी निगाह रहेगी।

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