नेशनल कॉन्फ्रेंस में बगावत की आहट, 25 विधायकों की नाराजगी का दावा

जम्मू, 02 नवंबर (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक तूफान आने की आहट है, क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर उठ रही नाराजगी अब बगावत का रूप लेने लगी है। पहले वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी, फिर बंद कमरे में विधायकों की बैठक और अब 25 विधायकों के असंतुष्ट होने तथा पार्टी नेतृत्व को 14 दिन का अल्टीमेटम देने की बात सामने आ रही है। अगर इनमें सच्चाई है, तो यह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब आने वाले दिनों में प्रदेश की सियासी तस्वीर तय कर सकता है। हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। हालांकि 25 विधायकों के एकजुट होने, 14 दिन का औपचारिक अल्टीमेटम देने और सभी मंत्रियों को हटाने की मांग की पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं ने सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि आखिर नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर सब कुछ ठीक क्यों नहीं दिखाई दे रहा।

सामने आ रही खबरों और दावों के मुताबिक नेशनल कॉन्फ्रेंस के असंतुष्ट विधायकों का एक गुट मौजूदा मंत्रिमंडल के गठन से खुश नहीं है। दावा किया जा रहा है कि नाराज विधायकों ने सभी मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाने और विधायकों की सहमति से नया मंत्रिमंडल बनाने की मांग उठाई है। अगर वास्तव में ऐसी मांग रखी गई है, तो यह केवल मंत्री पद पाने की नाराजगी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के फैसले लेने के तरीके पर भी सवाल है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात नाराज विधायकों की संख्या को लेकर किए जा रहे दावे हैं। पहले कम से कम 18 विधायकों के असंतुष्ट होने की चर्चा सामने आई थी, जबकि अब यह संख्या 25 तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। यदि 25 विधायक वास्तव में एक साझा राजनीतिक रुख अपनाते हैं, तो यह नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर बड़ी चुनौती होगी, लेकिन नाराज होना, पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खड़ा होना और सरकार से समर्थन वापस लेना तीन अलग-अलग बातें हैं।

जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए सामान्य परिस्थितियों में 46 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। वर्ष 2024 के चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को 29, कांग्रेस को 6 और पीडीपी को 3 सीटें मिली थीं। ऐसे में सरकार की स्थिरता का फैसला केवल नाराज विधायकों की संख्या से नहीं, बल्कि विधानसभा में वास्तविक समर्थन और गठबंधन के गणित से होगा। इस राजनीतिक हलचल के बीच आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी को लेकर भी बड़े दावे सामने आए हैं। उनके नेशनल कॉन्फ्रेंस से इस्तीफे, अनुच्छेद 370 पर असहमति के चलते 3 नवंबर को लोकसभा सदस्यता छोड़ने और जम्मू-कश्मीर में नया राजनीतिक विकल्प तैयार करने की चर्चाएं चल रही हैं।

हालांकि, इन दावों को औपचारिक घोषणा और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से पुष्टि होने तक अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता। रूहुल्लाह लंबे समय से अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक अधिकारों और राज्य के दर्जे जैसे मुद्दों पर मुखर रहे हैं। ऐसे में यदि वह नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग राजनीतिक रास्ता चुनते हैं, तो इसका असर केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कश्मीर की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे सकता है।

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद वरिष्ठ नेता मुबारक गुल के समर्थकों ने विरोध जताया। अब्दुल मजीद लारमी ने भी मंत्री पद नहीं मिलने पर अपनी नाराजगी जाहिर की। इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। सवाल यह है कि क्या नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व ने मंत्रिमंडल गठन के दौरान वरिष्ठता, अनुभव, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठन के प्रति वफादारी के बीच सही संतुलन बनाया?

नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष की खबरों ने भाजपा को भी सरकार पर हमला करने का अवसर दिया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा पहले ही दावा कर चुके हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर मतभेद बढ़ रहे हैं और आने वाले समय में पार्टी तथा सरकार दोनों टूट सकती हैं। अब यहां राजनीतिक सवाल यह है कि यदि नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर नाराजगी और बढ़ती है, तो क्या भाजपा केवल विपक्ष की भूमिका निभाएगी या बदलती परिस्थितियों में नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे।

फिलहाल भाजपा की ओर से सरकार बनाने की किसी ठोस पहल का प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए राजनीतिक भविष्यवाणियों को मौजूदा हकीकत समझना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि सत्तारूढ़ पार्टी की अंदरूनी नाराजगी विपक्ष के लिए राजनीतिक हथियार बन चुकी है।राजनीतिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि यदि 25 विधायक बगावत करते हैं, तो उमर अब्दुल्ला सरकार गिर सकती है और पार्टी का चुनाव चिह्न भी असंतुष्ट गुट को मिल सकता है।

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