नई दिल्ली, 30 सितंबर (हि.स.)। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान में कथित ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। कांग्रेस ने इसे खरगे ही नहीं, बल्कि दलित-आदिवासी समाज के आत्मसम्मान पर आघात बताया है। इसके विरोध में कांग्रेस के एससी-एसटी फोरम ने यहां मावलंकर हॉल में ‘दलित-आदिवासी स्वाभिमान बैठक’ आयोजित कर देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत की।
इस अभियान का नेतृत्व कर रहे तेलंगाना के नागरकुरनूल से कांग्रेस सांसद डॉ. मल्लू रवि ने ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से विशेष बातचीत में हल्द्वानी घटना, राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामलों, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’, परिसीमन, चुनाव आयोग के एसआईआर और जाति जनगणना सहित विभिन्न मुद्दों पर पार्टी का रुख साझा किया। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
सवाल: हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर आपकी शिकायत पर कार्रवाई धीमी रही और उल्टे राहुल गांधी पर मुकदमा दर्ज हुआ। बेंगलुरु में जीरो एफआईआर भी दर्ज हुई। पूरे मामले में अब तक क्या हुआ और आगे क्या करेंगे?
जवाब: लोकसभा और राज्यसभा के एससी-एसटी सांसदों ने 7 सितंबर को इंदिरापुरम में बैठक कर मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यक्रम के बाद हुए कथित शुद्धिकरण पर चर्चा की। सांसदों ने इसे खरगे ही नहीं, बल्कि पूरे एससी-एसटी समाज का अपमान बताया। इसके विरोध में 8 सितंबर को करीब 22 सांसद संसद मार्ग थाने पहुंचे और जीरो एफआईआर दर्ज करने की मांग की लेकिन पुलिस ने इनकार कर दिया। सांसद करीब साढ़े तीन घंटे थाने में धरने पर बैठे। बाद में पुलिस ने हल्द्वानी में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर में उनकी शिकायत जोड़ने की बात कही। मल्लू रवि ने आरोप लगाया कि अब तक निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने राहुल गांधी पर दर्ज एफआईआर को निरस्त करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
सवाल: आज से शुरू हुए इस ‘आत्मसम्मान अभियान’ की जमीनी रूपरेखा क्या है? क्या यह केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शनों तक सीमित रहेगा या इसे जमीनी स्तर पर दलित लामबंदी और राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा?
जवाब: कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के मावलंकर हॉल में आयोजित ‘दलित-आदिवासी स्वाभिमान बैठक’ में देशभर से एक हजार से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में हल्द्वानी की घटना की निंदा करते हुए केंद्र और उत्तराखंड सरकार से त्वरित कार्रवाई की मांग का प्रस्ताव पारित किया गया। साथ ही दलित-आदिवासी समाज के हक की लड़ाई के लिए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव भी पारित हुआ। इस अभियान को देश के हर राज्य में ले जाया जाएगा और स्थानीय एससी-एसटी नेताओं के नेतृत्व में बैठकें आयोजित की जाएंगी। नवंबर के अंतिम सप्ताह में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में राष्ट्रीय सम्मेलन प्रस्तावित है, जिसमें राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के शामिल होने की बात है। यह अभियान बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के मंत्र और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से न्याय की लड़ाई पर आधारित होगा।
सवाल: भाजपा और कुछ संगठनों का दावा है कि यह व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि रामलीला मैदान की धार्मिक पवित्रता से जुड़ा स्थानीय मामला था। कांग्रेस इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है। इस पर आपका क्या जवाब है?
जवाब: यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण तर्क है। दिल्ली में भी रामलीला मैदान है, जहां कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा सहित सभी दल राजनीतिक रैलियां करते हैं। इसका यह मतलब तो नहीं कि वहां केवल धार्मिक मुद्दों पर ही चर्चा होगी, वहां हमेशा से राजनीतिक विषयों पर चर्चा होती आई है। मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं। उन्होंने वहां राजनीतिक भाषण दिया, किसी के खिलाफ कोई गलत बात नहीं कही। क्या सिर्फ रामलीला मैदान होने के कारण किसी दलित या पिछड़े वर्ग के नेता को वहां जाकर बोलने की इजाजत नहीं होगी? बाकी सभी नेता वहां राजनीतिक भाषण देते हैं।
सवाल: राज्यसभा में सत्ता पक्ष के नेताओं ने इस घटना की निंदा की थी और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। फिर भी आप लोगों को यह आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?
जवाब: राज्यसभा में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और नेता सदन जेपी नड्डा ने स्पष्ट रूप से भरोसा दिलाया था कि इस मामले में सख्त कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सदन में दिए गए इस आश्वासन के बावजूद क्या हुआ? उत्तराखंड के मुख्यमंत्री इस घटना को सही ठहराने वाले रुख का समर्थन करते रहे, देश के प्रधानमंत्री ने इस पर एक शब्द नहीं बोला और केंद्रीय गृह मंत्री ने कोई आधिकारिक बयान तक नहीं दिया। जब कोई कार्रवाई नहीं हो रही है तो इसका सीधा अर्थ है कि इस शुद्धिकरण कांड को प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का मौन समर्थन प्राप्त है।
सवाल: मल्लिकार्जुन खरगे देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के निर्वाचित अध्यक्ष हैं। इस घटना को आप सिर्फ एक नेता के अपमान के तौर पर देखते हैं या इसे पूरे बहुजन समाज के आत्मसम्मान पर सीधा हमला मानते हैं?
जवाब: यह मल्लिकार्जुन खरगे पर व्यक्तिगत हमला नहीं है। यह उन पर कोई शारीरिक हमला नहीं था बल्कि यह मानसिक चोट है जो उनके जरिए देश के समस्त दलित और आदिवासी समाज को पहुंचाई गई है। साथ ही यह कांग्रेस पार्टी पर भी हमला है क्योंकि वे पार्टी के निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी मर्जी से संविधान से इतर जाकर कांग्रेस और एससी-एसटी समुदाय को निशाना बना सकते हैं।
सवाल: संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण) पारित हुआ, लेकिन इसे अगली जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया है। कांग्रेस इसे तत्काल और ओबीसी/एससी/एसटी के भीतर कोटे के साथ लागू कराने के लिए क्या कर रही है?
जवाब: कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण को तुरंत प्रभाव से लागू करने के पक्ष में है। वास्तव में यह विधेयक सबसे पहले कांग्रेस सरकार के समय ही राज्यसभा में पारित कराया गया था। हम चाहते हैं कि यह तुरंत पूर्ण रूप से कानून बनकर लागू हो। लेकिन केंद्र सरकार ने जानबूझकर महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया के साथ उलझा दिया है। यदि सरकार की मंशा साफ है तो वह महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करे और तुरंत लागू करे, हम उसका शत-प्रतिशत समर्थन करेंगे। हमारी यह भी स्पष्ट मांग है कि इस आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं को उनकी आबादी के अनुपात में उनका उचित हिस्सा (कोटा) अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए।
सवाल: दक्षिणी राज्यों में परिसीमन को लेकर गंभीर आशंकाएं हैं कि जनसंख्या नियंत्रण लागू करने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा और उत्तर भारत का वर्चस्व बढ़ेगा। एक दक्षिण भारतीय सांसद के रूप में आपका क्या गणित और रुख है?
जवाब: परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों की चिंता बेहद गंभीर और वास्तविक है। दक्षिण भारत के राज्यों ने भारत सरकार के परिवार नियोजन कार्यक्रम को पूरी निष्ठा से लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप वहां जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित हुई। अब यदि केंद्र सरकार केवल आबादी को आधार बनाकर परिसीमन करती है या 50 प्रतिशत सीटें हर राज्य में बढ़ाने की बात करती है, तो यह दक्षिण के साथ सरासर अन्याय होगा।
इसे एक सीधे उदाहरण से समझिए: आज केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं और उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं, यानी दोनों के बीच 60 सीटों का अंतर है। यदि दोनों राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ा दी जाएं, तो केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 होंगी, जबकि उत्तर प्रदेश की 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। तब यह अंतर 60 से बढ़कर सीधे 90 सीटों का हो जाएगा। इसी तरह तेलंगाना या तमिलनाडु के मुकाबले उत्तर भारत के राज्यों का अंतर बहुत बड़ा हो जाएगा। यदि उत्तर भारत में इतनी ज्यादा सीटें बढ़ जाएंगी तो देश के प्रधानमंत्री के चयन में दक्षिण भारत की कोई निर्णायक भूमिका ही नहीं रह जाएगी। जब सत्ता में दक्षिण पर कोई निर्भरता नहीं होगी तो सरकारें न तो दक्षिण के विकास और बजट पर ध्यान देंगी और न ही यहां के हितों की परवाह करेंगी। हमारा स्पष्ट कहना है कि यदि परिसीमन होता भी है तो राज्यों के बीच वर्तमान में सीटों का जो संख्यात्मक अंतर है, वह अंतर वही रहना चाहिए, उसमें असंतुलन नहीं आना चाहिए।
सवाल: संसद के भीतर और बाहर क्या दक्षिणी राज्यों के सभी दल इस बात पर एकजुट होंगे कि परिसीमन से पहले वित्तीय और संसदीय संतुलन की वैधानिक गारंटी दी जाए?
जवाब: निश्चित रूप से। हम सभी एकजुट होकर लोकतांत्रिक वित्तीय विकेंद्रीकरण, बजट के समान बंटवारे और सभी नागरिकों के समान अधिकारों की गारंटी की मांग करेंगे। उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा नहीं होने दिया जाएगा। यदि किसी राज्य ने राष्ट्रीय नीति का पालन करते हुए जनसंख्या को नियंत्रित किया है तो उसे संसद में अपनी आवाज खोकर इसकी सजा नहीं भुगतनी चाहिए।
सवाल: मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित तो हुआ लेकिन उसका औपचारिक सत्रावसान (प्रोरोगेशन) नहीं हुआ है। क्या विपक्ष को अंदेशा है कि सरकार अचानक कोई विशेष सत्र बुलाकर विवादित विधेयक ला सकती है?
जवाब: सरकार के पास विशेष सत्र बुलाने का वैधानिक अधिकार है, वे ऐसा कर सकते हैं। लेकिन हमारा मुख्य सरोकार यह है कि वे दक्षिण भारत या उन छोटे राज्यों के साथ अन्याय न करें जिन्होंने राष्ट्रीय जनसंख्या नीतियों का कड़ाई से पालन किया है। किसी भी अप्रत्याशित विधायी कदम का मुकाबला संसद और लोकतांत्रिक मंचों पर पूरी ताकत से किया जाएगा।
सवाल: केंद्र सरकार ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। संसद में इसका विरोध करने की कांग्रेस की क्या तैयारी है?
जवाब: कांग्रेस पार्टी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के विचार का पूरी तरह विरोध करती है। भारत एक विशाल और बहु-राज्यीय संघीय व्यवस्था है। किसी भी लोकतांत्रिक संघीय ढांचे में विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों के चलते राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव की नौबत आती है। कभी किसी राज्य में सरकार गिरती है तो कभी केंद्र की सरकार बीच में गिर जाती है। हमने 1996 और 1998 में देखा है कि जब केंद्र सरकार गिरी तो सिर्फ लोकसभा के चुनाव कराए गए, राज्यों की विधानसभाओं को जबरन भंग नहीं किया गया। हमारा देश तानाशाही से नहीं बल्कि संसदीय लोकतंत्र और संविधान के अनुसार चलता है। किसी एक नियम को थोपकर पूरे देश के संघीय ढांचे को नष्ट नहीं किया जा सकता। हम संसद के भीतर और बाहर इसका कड़ा विरोध करेंगे।
सवाल: आपने चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनर्रीक्षण (एसआईआर) पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। क्या विपक्ष को आशंका है कि इसके जरिए जानबूझकर वंचित वर्गों को मताधिकार से बेदखल किया जा रहा है?
जवाब: यह बेहद गंभीर विषय है, जिसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद में पुरजोर तरीके से उठाया था। पूरे सत्र के दौरान हमने मांग की कि प्रधानमंत्री या गृह मंत्री एसआईआर की इस प्रक्रिया पर संसद में स्पष्टीकरण दें लेकिन सरकार चर्चा से भागती रही। अब मीडिया में जो खुलासे हुए हैं, वे दिखाते हैं कि चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त साथी चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना मनमाने फैसले ले रहे हैं। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक फैसले सर्वसम्मति या कम से कम दो-तिहाई बहुमत से होने चाहिए, लेकिन यहां दोनों आयुक्तों की असहमति के बावजूद फैसले थोपे गए।
सवाल: राहुल गांधी देशव्यापी जाति जनगणना और आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाने की मांग कर रहे हैं। केंद्र के रुख के बीच कांग्रेस शासित राज्य इसे कैसे आगे बढ़ा रहे हैं?
जवाब: जब तक यह सरकार है, हम राजनीतिक और लोकतांत्रिक रूप से इसके लिए लड़ते रहेंगे। राहुल गांधी के दिशा-निर्देश पर तेलंगाना में मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी की सरकार ने विधानसभा में जाति जनगणना और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कराया है और इसे संसद से कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार को भेजा है, जो फिलहाल केंद्र के पास लंबित है। केंद्र सरकार कह रही है कि वह सामान्य जनगणना के साथ इसे करेगी, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली में स्पष्टता नहीं है। वे केवल खानापूर्ति कर रहे हैं। जब तक आप पिछड़े वर्गों में यह नहीं पहचानेंगे कि कौन अत्यधिक पिछड़ा है, किसे रोजगार मिला और किसे नहीं मिला, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कौन कहां है, तब तक यह अदालत में नहीं टिकेगा।
