जन संघर्ष समिति ने जताई आपत्ति, झीरम के दोषियों को मृत्युदंड, ताे भूपति की जीयू में नियुक्ति के मानदंड क्या हैं?

गोंडवाना विश्वविद्यालय में भूपति की नियुक्ति पर उठे सवालनागपुर, 17 सितंबर (हि.स.)। जन संघर्ष समिति ने गुरुवार काे गढ़चिरौली के पूर्व नक्सली नेता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति को गोंडवाना विश्वविद्यालय (जीयू)के ‘एकल’ उपक्रम में समन्वयक की जिम्मेदारी दिए जाने पर अपनी आपत्ति जताई है।

छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी हमले के मामले में अदालत के फैसले की पृष्ठभूमि में नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटे लोगों को सार्वजनिक संस्थानों में जिम्मेदारी देने की नीति पर नए सिरे से सवाल उठाए जा रहे हैं। जन संघर्ष समिति ने आज अपने बयान में भूपति को गोंडवाना विश्वविद्यालय में जिम्मेदारी देने पर आपत्ति जताते हुए चयन समिति और नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित जानकारी पर सवाल उठाने के साथ स्पष्टीकरण की मांग की गई है।

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने वर्ष 2013 के झीरम घाटी हमले के मामले में 16 सितंबर- 26 को 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले में वरिष्ठ नेताओं सहित 32 लोगों की मौत हुई थी और 38 लाेग घायल हुए थे।

इस फैसले के बाद नक्सली हिंसा, पीड़ित परिवारों को न्याय और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

भूपति ने अक्टूबर 2025 में अपने 61 साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों, पेसा कानून और वनाधिकार कानून से संबंधित उनके अनुभव का उपयोग करने के उद्देश्य से उन्हें गोंडवाना विश्वविद्यालय के ‘एकल’ उपक्रम में समन्वयक की जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी सामने आई।

इस भूमिका के तहत ग्रामसभा, ग्रामीणों और प्रशासन के बीच समन्वय के साथ-साथ पेसा और वनाधिकार से संबंधित प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन की अपेक्षा बताई गई है।

हालांकि, इस नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर भामरागढ़ की संयुक्त ग्रामसभा और पारंपरिक गोटुल समिति ने भी सवाल उठाए हैं। नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था या नहीं, पात्रता के मानदंड क्या थे? चयन समिति में कौन-कौन शामिल था और चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया, इसकी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

जन संघर्ष समिति के अध्यक्ष दत्ता शिर्के ने आज कहा कि उनका सवाल किसी व्यक्ति विशेष के विरोध से संबंधित नहीं, बल्कि नीति और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है। समिति ने स्पष्ट किया है कि वह नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के पुनर्वास का विरोध नहीं करती।

हालांकि, ऐसे व्यक्तियों को विश्वविद्यालय या अन्य सार्वजनिक संस्थानों में जिम्मेदारी सौंपते समय नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मूलभूत जानकारी सार्वजनिक होना आवश्यक है।

समिति ने यह भी सवाल उठाया है कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पूर्व में कौन-कौन से मामले दर्ज थे, किन मामलों में उनकी भूमिका की जांच की गई, क्या आवश्यक सुरक्षा सत्यापन किया गया, नियुक्ति के लिए पात्रता के क्या मानदंड निर्धारित किए गए और क्या स्थानीय ग्रामसभाओं तथा आदिवासी समाज से परामर्श किया गया। चयन समिति और नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की गई है या नहीं, इस पर भी उनकी ओर से स्पष्टीकरण की मांग की गई है।

समिति के अनुसार, आत्मसमर्पण पुनर्वास प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण हो सकता है, लेकिन इसके आधार पर नियुक्ति से जुड़े अन्य सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समिति का कहना है कि पुनर्वास और किसी व्यक्ति को सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंपना दो अलग-अलग विषय हैं।

वहीं, नियुक्ति का समर्थन करने वाले पक्ष की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि भूपति के अनुभव का उपयोग आदिवासी समाज को पेसा और वनाधिकार कानून से संबंधित प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन देने के लिए किया जा सकता है। ऐसे में इस मामले में आत्मसमर्पण करने वाले व्यक्तियों का पुनर्वास, स्थानीय समाज का विश्वास और सार्वजनिक संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता—ये तीन प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं।

झीरम घाटी मामले में आए न्यायालय के फैसले के बाद नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने के साथ-साथ आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास नीति के स्वरूप पर भी चर्चा तेज हुई है। इस पृष्ठभूमि में जन संघर्ष समिति ने मांग की है कि भूपति की नियुक्ति की प्रक्रिया, पात्रता, सुरक्षा सत्यापन तथा सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारी को लेकर राज्य सरकार और गोंडवाना विश्वविद्यालय की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया जाए।

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