डिजिटल स्वास्थ्य संसाधनों से मजबूत होगी भारत की शोध संस्कृति: स्वास्थ्य सचिव

नई दिल्ली, 09 अक्टूबर (हि.स.)। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि डिजिटल स्वास्थ्य संसाधन भारत में शोध की संस्कृति विकसित करने और चिकित्सा शिक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश में अपनी शोध क्षमताओं को विकसित करने के लिए शोध के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय (एनएमएल) के नेटवर्क का विस्तार 93 मेडिकल कॉलेजों तक हो चुका है। अब इसे देश के सभी मेडिकल कॉलेजों तक पहुंचाने की दिशा में काम करना चाहिए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां संसाधनों की कमी है।

श्रीवास्तव शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय में आयोजित ईआरएमईडी कंसोर्टियम के पांचवें एक दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण-सह-सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अंतर्गत आयोजित इस सम्मेलन का विषय ‘डिजिटल हेल्थ रिसोर्सेज: लाइब्रेरीज के माध्यम से पहुंच को नए सिरे से परिभाषित करना’ था। इसका उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पद्धति में डिजिटल ज्ञान संसाधनों की भूमिका को मजबूत करना था।

स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में निरंतर सीखना और पेशेवर कौशल का विकास बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। नई बीमारियों की पहचान हो रही है, उपचार के नए तरीके विकसित हो रहे हैं और चिकित्सा पद्धतियों में लगातार बदलाव आ रहे हैं। ऐसे में सुसज्जित पुस्तकालयों और आसानी से उपलब्ध डिजिटल संसाधनों से डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को नवीनतम जानकारी मिल सकेगी, जिससे मरीजों को बेहतर उपचार देने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा कि डिजिटल स्वास्थ्य संसाधन केवल जानकारी हासिल करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि देश में मजबूत शोध तंत्र विकसित करने के महत्वपूर्ण आधार भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वदेशी शोध क्षमताओं को बढ़ाने और वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों में हुए शोध से लाभ उठाया जा सकता है, लेकिन केवल उसी पर निर्भर रहकर भारत अपनी आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता। इसके लिए देश में शोध की संस्कृति और मौलिक अनुसंधान की क्षमता विकसित करनी होगी।

श्रीवास्तव ने कहा कि ‘वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन’ पहल और ईआरएमईडी कंसोर्टियम शोध पत्रों और अकादमिक प्रकाशनों तक पहुंच बढ़ाने में एक-दूसरे के पूरक हैं। इन पहलों से चिकित्सा शिक्षा में साक्ष्य-आधारित अध्ययन को बढ़ावा देने और शोध एवं नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में मदद मिलेगी। उन्होंने राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय को एक महत्वपूर्ण संस्थान बताते हुए कहा कि इसे विकसित भारत के लक्ष्य में योगदान देने के लिए ज्ञान तक पहुंच का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए।

उन्होंने पुस्तकालय से डिजिटल स्वास्थ्य संसाधनों की पहुंच मजबूत करने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार करने को कहा। साथ ही, चिकित्सा शिक्षा, शोध और पेशेवर विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की संभावनाओं पर भी विचार करने का सुझाव दिया। उन्होंने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के चिकित्सा संस्थानों के बीच बेहतर पुस्तकालय प्रबंधन की प्रक्रियाओं, अनुभवों और उपयोगी तरीकों को साझा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम में अतिरिक्त सचिव डॉ. विनोद कोटवाल ने कहा कि भौतिक संपत्ति खर्च करने पर कम हो सकती है, लेकिन ज्ञान साझा करने से बढ़ता है। पुस्तकालय इसी ज्ञान-साझाकरण की भावना पर आधारित हैं। मेडिकल कॉलेज के तीन प्रमुख स्तंभ हैं—शिक्षक, बुनियादी ढांचा और ज्ञान संसाधन। पुस्तकों, शोध पत्रिकाओं और अन्य अकादमिक सामग्री तक पहुंच चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण है। सम्मेलन में डिजिटल चिकित्सा ज्ञान तक पहुंच बढ़ाने और उसके प्रभावी उपयोग पर चर्चा के साथ चार डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यावहारिक प्रशिक्षण भी आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को डिजिटल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में सक्षम बनाना था, ताकि उपलब्ध जानकारी को शोध के प्रमाणों और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं में बदला जा सके।

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