पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए अचानक और एकतरफा प्रशासनिक फेरबदल पर असंतोष व्यक्त किया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा कि विधानसभा चुनाव की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर आयोग ने शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को हटाने के फैसले लिए। इन अधिकारियों में मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक शामिल थे। ये तबादले बिना किसी वैध कारण के किए गए। जिन अधिकारियों के तबादले किए गए उन पर कदाचार, लापरवाही या चुनाव प्रक्रिया के उल्लंघन का कोई आरोप नहीं था।
मुख्यमंत्री ने पत्र में लिखा है कि वर्ष 1951 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत, निर्वाचन आयोग को चुनाव की घोषणा के बाद चुनाव प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों को स्थानांतरित या नियुक्त करने का अधिकार है। हालांकि, इससे पहले आयोग अधिकारियों के तबादले संबंधी आदेश जारी करने से पहले राज्य सरकार से परामर्श करके संवैधानिक औचित्य और प्रशासनिक परंपरा का पालन करता था। आमतौर पर, रिक्तियों को भरने के लिए आयोग, राज्य सरकार से तीन नामों का प्रस्ताव मांगता था, जिनमें से एक को नियुक्त किया जाता था।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग, संघवाद के सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य कर रहा है और लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना कर रहा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग, उच्च संवैधानिक निकाय है और उससे संघीय मूल्यों के अनुरूप कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने आग्रह किया कि भविष्य में आयोग को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और एकतरफा निर्णय नहीं लेने चाहिए, क्योंकि ऐसे निर्णयों से आयोग की विश्वसनीयता को ठेस पहुंचती है।
