नई दिल्ली, 13 जनवरी: सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों पर लावारिस कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों और संगठनों के आचरण पर सख्त सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या दया केवल जानवरों तक ही सीमित है और मनुष्यों तक नहीं ? न्यायालय ने जवाबदेही पर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि लावारिस कुत्ते के हमले में किसी बच्चे की मौत हो जाती है तो कौन जिम्मेदार होगा। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए पिछले साल जुलाई से इसकी सुनवाई कर रहा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि पशु जन्म नियंत्रण नियम मुख्य रूप से नसबंदी पर केंद्रित हैं, जो लावारिस कुत्तों की समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं देते और न ही हमलों के जोखिम को पूरी तरह समाप्त करते हैं। पीठ ने 8 जनवरी की पिछली सुनवाई का उल्लेख करते हुए एबीसी नियमों के खराब कार्यान्वयन पर नाराजगी जताई और स्पष्ट किया कि उसने कभी भी सभी लावारिस कुत्तों को हटाने का आदेश नहीं दिया है। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि लावारिस कुत्ते वन्यजीवों में बीमारियां फैला सकते हैं। सुनवाई के दौरान ऐसे मामलों का जिक्र भी किया गया, जहां कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण बाघ जैसे जानवरों में फैल गए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने न्यायालय से आग्रह किया कि इस मुद्दे को मनुष्य बनाम कुत्ते के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता के तौर पर समझा जाए। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने का एकमात्र प्रभावी तरीका नसबंदी है और समस्या के लिए नियामक विफलताओं को जिम्मेदार ठहराया।
