School : कांस्टेबल थान सिंह की पाठशाला में पल रहे हैं सपने

नई दिल्ली , 04 अप्रैल (हि.स.)। कहते है कि अंधेरे की तकलीफ केवल अंधेरे में रहने वाला ही जानता है। खुद तकलीफ भरी जिंदगी से गुजर चुके कांस्टेबल का भी यहीं कहना है कि कोई गरीब का बच्चा अंधकार में न रह जाये। वो भी बड़े सपने देख सके और अपनी जिंदगी में आगे कुछ कर पाये। कुछ ऐसा ही सोचकर छह साल पहले कांस्टेबल थान सिंह ने एक छोटी सी पाठशाला खोली।

‘हिन्दुस्थान समाचार’ से बातचीत में कांस्टेबल थान सिंह ने बताया कि लाल किला के आसपास मजदूरी करने वाले लोगों के बच्चे सड़क पर कूड़ा बिन रहे थे। जिन्हें देखकर उन्हें लगा कि जिन नन्हें हाथों में किताब होनी चाहिए उन हाथों में कूड़े का थैला था। कांस्टेबल थान सिंह ने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने का मन बनाया और उन छोटों बच्चों को इक्ट्ठा करना शुरू किया।

शुरूआत में कई बच्चों के अभिभावक तैयार नहीं हुए। लेकिन थान सिंह ने उन्हें समझाने का प्रयास किया। उनका प्रयास काफी हद तक सफल हुआ और उनकी पाठशाला में बच्चों का आना शुरू हुआ। थान सिंह बताते है शुरूआत में दो से तीन ही बच्चे आये, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने सड़क पर ऐसे बच्चों को खोजना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़नी लगी।

सपने पूरे करने के लिये जाएंगे स्कूल

थान सिंह ने आगे बताया कि लगातार प्रयास के बाद उत्तरी जिले के डीसीपी सागर सिंह कलसी ने दिल्ली सरकार से बात की। जिससे यह बच्चे स्कूल जा सकें। अभी तक ऐसे लगभग 50 बच्चे कांस्टेबल थान सिंह की पाठशाला में पढ़ रहे हैं। इनमें से 20 बच्चों को डीसीपी सागर सिंह कलसी ने स्कूल में दाखिला करवाने के लिए चुना है। वह दिल्ली सरकार के अधिकारियों से उनके दाखिले के लिए संपर्क कर रहे हैं ताकि इन बच्चों को पूरी शिक्षा मिल सके।

गरीबी को करीब से देखा है कांस्टेबल थान सिंह ने

वर्ष 2010 में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए कांस्टेबल थान सिंह ने बताया कि वह परिवार के साथ मीरा बाग में रहते थे। वह जेजे कल्स्टर क्षेत्र था। उनके समय में वहां ठीक से लाइट भी नहीं होती थी। आस-पास के लोगों को उन्होंने उस अंधेरे में भटकते हुए देखा था। या यह कहे कि कोई उस समय मार्ग दिखाने वाला नहीं था। दिन में पिता के साथ कपड़े प्रेस करने के बाद वह दोपहर में स्कूल जाते थे।

आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई के दौरान उन्हें काफी दिक्कत हुई। अतीत के अनुभवों को ध्यान रख कांस्टेबल थान सिंह ने भी सोचा कि अंधकार में भटक रहे उन बच्चों को कम से कम वह प्राथमिक शिक्षा दे सके। जिससे वह सही व गलत समझ सके।

दोपहर ढ़ाई बजे से पांच बजे तक सजती है पाठशाला

बात-चीत के दौरान कांस्टेबल ने बताया कि शुरूआत में काफी दिक्कत हुई। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एक कॉलेज का छात्र मिला। जिनके साथ मिलकर उन्होंने इन बच्चों को पढाना शुरू किया। दोपहर ढ़ाई बजे से पांच बजे तक वह बच्चों को पढ़ाते है।

कई कॉलेज के छात्र भी अब आते हैं पढ़ाने

कांस्टेबल की माने तो अब उनके साथ धीरे-धीरे लोग जुड रहे है। माता सुंदरी कॉलेज से कुछ छात्र-छात्राएं भी आते है, जो इन बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहे है। इसी में एक-बहन भाई भी है, जो बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहे है। बहन-भाई को पढ़ाने के लिये थान सिंह चार-चार हजार रुपये देते है। जिनसे वह भी अपनी पढ़ाई को और मजबूत कर सके।

पढ़ाई के साथ खेल-कूद का भी रखा जाता है ध्यान

थान सिंह केवल बच्चों को रोजाना दो से तीन घंटे पढ़ाते ही नहीं है बल्कि इस दौरान बच्चों को खेल कूद, चेस, फुटबॉल आदि खेलना भी सिखाते है। थान सिंह की यह पाठशाला आसपास उन बच्चों में काफी मशहूर है जिनके परिजन खुले आसमान के नीचे रहते हैं।

तीन से 15 साल के बच्चे हैं विद्यार्थी

कांस्टेबल थान सिंह ने बताया कि उनकी इस पाठशाला में तीन साल से 15 साल तक के बच्चे पढ़ाई करते है। उनका मानना है कि ऐसा करने से अधिक्तर बच्चे अपराध के रास्ते से भी बच पायेंगे। उन्हें सहीं एंव गलत का पता चलेगा। वहीं उन्हें उम्मीद है कि इन बच्चों को स्कूल में जल्द दाखिला मिलेगा और वह मेहनत से भविष्य में आगे बढ़ेंगे।